ये इश्क भी अजब है साहिब,
हर कोई यहाँ गुलाम इसका।
जग में ऊँच-नीच भले हो पर,
ना ख़ास, ना कोई आम इसका।
असर भी वो और भरम भी,
गिला भी उससे , महरम भी।
ये कशमकश इसकी ताकत है,
नया इजहार कलाम इसका।
हमसे पहले भी सबने किया,
हमारे बाद भी हर कोई करेगा।
मैं और तू तो बस धूल भर ,
सबसे बड़ा तो मकाम इसका।
ए इश्क ये ग़ज़ल की सदा तेरे लिए,
बरस हम पर भी कभी हुस्न में लिपटकर।
ओटक में खड़े हो इंतज़ार करते हैं,
जाने कब खाली हो हमाम इसका।
I am an agent of chaos and a perplexed freak !! लेकिन चंद लोग मेरे आस-पास ऐसे हैं जो मेरे लिए न केवल प्रेरणा हैं किन्तु उम्मीद की किरनें भी हैं !! बस उन्हीं को समर्पित....
Saturday, August 20, 2011
Monday, August 8, 2011
कुछ पंक्तियाँ तेरे लिए
होठों में तुम्हारे गुलाब हों ।
निगाहों में तेरा शबाब हो ।
कुछ हो न हो भले शाम में,
बस तेरे हुस्न की शराब हो !!
तेरी आँखें हैं कि सागर गहरा ।
मेरे दिल पे तेरा कब से पहरा ।
तमन्ना न दौलत की न ख्वाबों की,
बस फुर्सत हो और हो तेरा चेहरा।
राज कितने हों गहरे, तेरी आँखों से तो उथले हैं।
आज नाम लेकर पुकारा तूने तो अरमान मचले हैं।
सुना है शाम ढले तुम खिड़की पर आयीं थी,
सुबह से थे, बस अभी-२ तेरी गली से निकले हैं।
चाशनी से ज्यादा तो तेरी कशिश मीठी है।
ना जाने किस बात पे तू हमसे रूठी है।
मेरी ख्वाहिश तो तुझे रोज़ देखने भर की थी,
तुझे छीन लेंगे ये रकीब की अफवाह झूठी है।
निगाहों में तेरा शबाब हो ।
कुछ हो न हो भले शाम में,
बस तेरे हुस्न की शराब हो !!
तेरी आँखें हैं कि सागर गहरा ।
मेरे दिल पे तेरा कब से पहरा ।
तमन्ना न दौलत की न ख्वाबों की,
बस फुर्सत हो और हो तेरा चेहरा।
राज कितने हों गहरे, तेरी आँखों से तो उथले हैं।
आज नाम लेकर पुकारा तूने तो अरमान मचले हैं।
सुना है शाम ढले तुम खिड़की पर आयीं थी,
सुबह से थे, बस अभी-२ तेरी गली से निकले हैं।
चाशनी से ज्यादा तो तेरी कशिश मीठी है।
ना जाने किस बात पे तू हमसे रूठी है।
मेरी ख्वाहिश तो तुझे रोज़ देखने भर की थी,
तुझे छीन लेंगे ये रकीब की अफवाह झूठी है।
Friday, November 12, 2010
महफ़िल
पिछले कुछ दिनों में चंद ग़ज़लों से नज़रें चार हुईं। बेहतरीन लेखकों की इन रचनाओं को पढ़कर न केवल शांति मिली बल्कि चंद अशआर यहाँ शामिल करने को जी हो आया।
वह तो जान लेके भी वैसा ही सुबुक-नाम रहा,
इश्क के बाब में सब जुर्म हमारे निकले । -- परवीन शाकिर
किवाड़ अपने इसी डर से खोलते ही नहीं,
सिवा हवा के उन्हें कौन खटखटाएगा। -- मंज़ूर हाश्मी
हमें भी आ पड़ा है दोस्तों से कुछ काम यानी,
हमारे दोस्तों के बेवफा होने का वक़्त आया। -- पं हरिचंद 'अख्तर'
वो खिज़ां से है आज शर्मिन्दा,
जिसने रुस्वा किया बहारों को। -- सरदार अंजुम
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वह तो जान लेके भी वैसा ही सुबुक-नाम रहा,
इश्क के बाब में सब जुर्म हमारे निकले । -- परवीन शाकिर
किवाड़ अपने इसी डर से खोलते ही नहीं,
सिवा हवा के उन्हें कौन खटखटाएगा। -- मंज़ूर हाश्मी
हमें भी आ पड़ा है दोस्तों से कुछ काम यानी,
हमारे दोस्तों के बेवफा होने का वक़्त आया। -- पं हरिचंद 'अख्तर'
वो खिज़ां से है आज शर्मिन्दा,
जिसने रुस्वा किया बहारों को। -- सरदार अंजुम
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Thursday, November 11, 2010
खामोश पुर्जा
मेरी कोशिश है कि मैं बदलूँ
रेत घुले पानी की तरह ठहरूं
और निथर जाऊं
आज की धुंधली बयार को छोडूँ
और निखर जाऊं ।
मैं एक घाट का पानी
जाने कितने टीलों और
खेतों की मिट्टी से गुज़रकर
बह रहा हूँ
या बहने की कोशिश कर रहा हूँ,
नहीं जानता।
कितना धुआं एवं धसक लिए
ये हवा चल रही है
और मुझमें घुल रही है ।
रेत भाँति बैठा तो झोंका आया
हालात वही,
कुआँ फांद गया पर आगे
गहरी अँधियारी खाई ।
यह अकारण नहीं होता
इन् सबका सरोकार है मुझसे,
क्योंकि मैं समाज का
एक खामोश पुर्जा हूँ,
और ये हवा भी सामाजिक है ।
पर अब मैं बदलूँगा, निथरूंगा,
याद आया मैं तो पानी हूँ ।
समझो तो मैं अमृत,
वरना गरल भी हूँ।
देखो तो रास्ते जैसा टेढ़ा हूँ,
मानो तो सरल भी हूँ।
रेत घुले पानी की तरह ठहरूं
और निथर जाऊं
आज की धुंधली बयार को छोडूँ
और निखर जाऊं ।
मैं एक घाट का पानी
जाने कितने टीलों और
खेतों की मिट्टी से गुज़रकर
बह रहा हूँ
या बहने की कोशिश कर रहा हूँ,
नहीं जानता।
कितना धुआं एवं धसक लिए
ये हवा चल रही है
और मुझमें घुल रही है ।
रेत भाँति बैठा तो झोंका आया
हालात वही,
कुआँ फांद गया पर आगे
गहरी अँधियारी खाई ।
यह अकारण नहीं होता
इन् सबका सरोकार है मुझसे,
क्योंकि मैं समाज का
एक खामोश पुर्जा हूँ,
और ये हवा भी सामाजिक है ।
पर अब मैं बदलूँगा, निथरूंगा,
याद आया मैं तो पानी हूँ ।
समझो तो मैं अमृत,
वरना गरल भी हूँ।
देखो तो रास्ते जैसा टेढ़ा हूँ,
मानो तो सरल भी हूँ।
Monday, October 18, 2010
क़तील शिफ़ाई
पिछले कुछ दिनों में औरंगजेब खां क़तील शिफ़ाई साहब की कुछ ग़ज़लें पढने को मिली । पढ़ते हुए
ख्याल बस उनकी ग़ज़लों में ही रहा और खुद को ये ग़ज़ल यहाँ शामिल करने से रोक नहीं पाया।
क़तील साहब के गीत हों या ग़ज़लें, रूमानियत उनका एक अहम् हिस्सा रही है। यह रूमानी अंदाज़ ज़मीन से जुड़ा हुआ है इसीलिए उनके लिखे हुए अलफ़ाज़ हमें अपने आस-पास नज़र आते हैं। इसी रूमानियत की एक बानगी:
सावन के सुहाने मौसम में एक नार मिली बादल जैसी।
बे-पंख उड़ानें लेती है, जो अपने ही आँचल जैसी।
लाया है बनाकर उसको दुल्हन, ये जोबन, ये अलबेलापन,
इस उम्र में सर से पाँव तक लगती है ताजमहल जैसी।
चेहरे पे सजे आईने हैं, या दो बेदाग़ नगीने हैं,
किस झील से आई हैं धुलकर ये आँखें नीलकमल जैसी।
जो उसे देखे वह खो जाए, खो जाए तो शायर हो जाए,
उसका अंदाज़ है गीतों-सा, उसकी आवाज़ ग़ज़ल जैसी।
वह ऐसे 'क़तील' अब याद आये, सपना जैसे कोई दुहराए,
मैं आज भी उसको चाहता हूँ, पर बात कहाँ वह कल जैसी।
ख्याल बस उनकी ग़ज़लों में ही रहा और खुद को ये ग़ज़ल यहाँ शामिल करने से रोक नहीं पाया।
क़तील साहब के गीत हों या ग़ज़लें, रूमानियत उनका एक अहम् हिस्सा रही है। यह रूमानी अंदाज़ ज़मीन से जुड़ा हुआ है इसीलिए उनके लिखे हुए अलफ़ाज़ हमें अपने आस-पास नज़र आते हैं। इसी रूमानियत की एक बानगी:
बे-पंख उड़ानें लेती है, जो अपने ही आँचल जैसी।
लाया है बनाकर उसको दुल्हन, ये जोबन, ये अलबेलापन,
इस उम्र में सर से पाँव तक लगती है ताजमहल जैसी।
चेहरे पे सजे आईने हैं, या दो बेदाग़ नगीने हैं,
किस झील से आई हैं धुलकर ये आँखें नीलकमल जैसी।
जो उसे देखे वह खो जाए, खो जाए तो शायर हो जाए,
उसका अंदाज़ है गीतों-सा, उसकी आवाज़ ग़ज़ल जैसी।
वह ऐसे 'क़तील' अब याद आये, सपना जैसे कोई दुहराए,
मैं आज भी उसको चाहता हूँ, पर बात कहाँ वह कल जैसी।
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