मेरी कोशिश है कि मैं बदलूँ
रेत घुले पानी की तरह ठहरूं
और निथर जाऊं
आज की धुंधली बयार को छोडूँ
और निखर जाऊं ।
मैं एक घाट का पानी
जाने कितने टीलों और
खेतों की मिट्टी से गुज़रकर
बह रहा हूँ
या बहने की कोशिश कर रहा हूँ,
नहीं जानता।
कितना धुआं एवं धसक लिए
ये हवा चल रही है
और मुझमें घुल रही है ।
रेत भाँति बैठा तो झोंका आया
हालात वही,
कुआँ फांद गया पर आगे
गहरी अँधियारी खाई ।
यह अकारण नहीं होता
इन् सबका सरोकार है मुझसे,
क्योंकि मैं समाज का
एक खामोश पुर्जा हूँ,
और ये हवा भी सामाजिक है ।
पर अब मैं बदलूँगा, निथरूंगा,
याद आया मैं तो पानी हूँ ।
समझो तो मैं अमृत,
वरना गरल भी हूँ।
देखो तो रास्ते जैसा टेढ़ा हूँ,
मानो तो सरल भी हूँ।
I am an agent of chaos and a perplexed freak !! लेकिन चंद लोग मेरे आस-पास ऐसे हैं जो मेरे लिए न केवल प्रेरणा हैं किन्तु उम्मीद की किरनें भी हैं !! बस उन्हीं को समर्पित....
Showing posts with label चंद ख्याल. Show all posts
Showing posts with label चंद ख्याल. Show all posts
Thursday, November 11, 2010
Saturday, September 11, 2010
एक ख्वाब चले
चल सके तो एक ख्वाब चले।
खुदा करे आसपास शबाब चले।
तेरी आँखों का तिलिस्म ठहरे,
फिर कहाँ कोई रुआब चले।
तुम कभी सीधा सवाल पूछो,
तब तो कोई जवाब चले।
मैखाने की फितरत भी अजब,
शराबी गिरे पर शराब चले।
जहाँ भी हो अब चले आओ कि,
थमी धडकनों का हिसाब चले।
बेशक निगाह दरिया ना हो,
दर्द उठे तो सैलाब चले।
सच से पर्दा क्या उठा 'रोबिन',
महफ़िल से खुसूसी जनाब चले।
खुदा करे आसपास शबाब चले।
तेरी आँखों का तिलिस्म ठहरे,
फिर कहाँ कोई रुआब चले।
तुम कभी सीधा सवाल पूछो,
तब तो कोई जवाब चले।
मैखाने की फितरत भी अजब,
शराबी गिरे पर शराब चले।
जहाँ भी हो अब चले आओ कि,
थमी धडकनों का हिसाब चले।
बेशक निगाह दरिया ना हो,
दर्द उठे तो सैलाब चले।
सच से पर्दा क्या उठा 'रोबिन',
महफ़िल से खुसूसी जनाब चले।
Saturday, December 12, 2009
इंतज़ार का महकमा
तेरी यादों का सिलसिला थमा कब।
इस बेरहम बाज़ार में मैं जमा कब।
तू था तो कुछ ख़ुशमिज़ाजी थी,
तू नहीं तब भी है मुझे सदमा कब।
दुनिया की चकाचौंध से सब सराबोर,
खैर मुझे भाया ही था ये मजमा कब।
अपनाया भी 'औ' ठुकराया भी तूने ही,
बस ये बता दे चला ये मुकदमा कब।
इश्क की गलियाँ अब देख-भाल ली मैंने भी,
देखना है मैं देता हूँ किसी को चकमा कब।
उसके फ़िराक में रोज़ नुक्कड़ पर चाय चलती है 'रोबिन',
नामालूम करेंगे बंद ये इंतज़ार का महकमा कब।
इस बेरहम बाज़ार में मैं जमा कब।
तू था तो कुछ ख़ुशमिज़ाजी थी,
तू नहीं तब भी है मुझे सदमा कब।
दुनिया की चकाचौंध से सब सराबोर,
खैर मुझे भाया ही था ये मजमा कब।
अपनाया भी 'औ' ठुकराया भी तूने ही,
बस ये बता दे चला ये मुकदमा कब।
इश्क की गलियाँ अब देख-भाल ली मैंने भी,
देखना है मैं देता हूँ किसी को चकमा कब।
उसके फ़िराक में रोज़ नुक्कड़ पर चाय चलती है 'रोबिन',
नामालूम करेंगे बंद ये इंतज़ार का महकमा कब।
Tuesday, December 1, 2009
मजबूर इश्क
मेरा दिल तेरे इश्क में भले मजबूर सही।
दौलत के हाथों बिकना पर मुझे मंजूर नहीं।
ये दुनिया गर अपनों का ऐसे इम्तेहां लेती है,
नहीं चाहिए कोई, यहाँ से ले चल दूर कहीं।
तू हो और जरूरी असबाब हो जीने को,
फ़िर ना आसमां चाहिए 'रोबिन' ना जमीं।
मरने के बाद कुछ नसीब होता हो तो तू हो,
न किस्मत चाहिए न जन्नत की दिलकशीं।
दौलत के हाथों बिकना पर मुझे मंजूर नहीं।
ये दुनिया गर अपनों का ऐसे इम्तेहां लेती है,
नहीं चाहिए कोई, यहाँ से ले चल दूर कहीं।
तू हो और जरूरी असबाब हो जीने को,
फ़िर ना आसमां चाहिए 'रोबिन' ना जमीं।
मरने के बाद कुछ नसीब होता हो तो तू हो,
न किस्मत चाहिए न जन्नत की दिलकशीं।
Thursday, October 1, 2009
मजाज़
आप खुश हुए तो ख़ुद पे भी नाज़ आया।
ज़िन्दगी और हसीनतर जीने का अंदाज़ आया।
दर्द हद से फिर बढ़ा उसके पास ना होने से ,
लगा जैसे 'रोबिन' में उतर कहीं से 'मजाज़' आया।
ज़िन्दगी और हसीनतर जीने का अंदाज़ आया।
दर्द हद से फिर बढ़ा उसके पास ना होने से ,
लगा जैसे 'रोबिन' में उतर कहीं से 'मजाज़' आया।
Monday, March 30, 2009
Monday, March 2, 2009
Subscribe to:
Posts (Atom)
save tiger
save animals