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Thursday, November 11, 2010

खामोश पुर्जा

मेरी कोशिश है कि मैं बदलूँ
रेत घुले पानी की तरह ठहरूं
और निथर जाऊं
आज की धुंधली बयार को छोडूँ
और निखर जाऊं ।
मैं एक घाट का पानी
जाने कितने टीलों और
खेतों की मिट्टी से गुज़रकर
बह रहा हूँ
या बहने की कोशिश कर रहा हूँ,
नहीं जानता।
कितना धुआं एवं धसक लिए
ये हवा चल रही है
और मुझमें घुल रही है ।
रेत भाँति बैठा तो झोंका आया
हालात वही,
कुआँ फांद गया पर आगे
गहरी अँधियारी खाई ।
यह अकारण नहीं होता
इन् सबका सरोकार है मुझसे,
क्योंकि मैं समाज का
एक खामोश पुर्जा हूँ,
और ये हवा भी सामाजिक है ।
पर अब मैं बदलूँगा, निथरूंगा,
याद आया मैं तो पानी हूँ ।
समझो तो मैं अमृत,
वरना गरल भी हूँ।
देखो तो रास्ते जैसा टेढ़ा हूँ,
मानो तो सरल भी हूँ।

Saturday, September 11, 2010

एक ख्वाब चले

चल सके तो एक ख्वाब चले।
खुदा करे आसपास शबाब चले।

तेरी आँखों का तिलिस्म ठहरे,
फिर कहाँ कोई रुआब चले।

तुम कभी सीधा सवाल पूछो,
तब तो कोई जवाब चले।

मैखाने की फितरत भी अजब,
शराबी गिरे पर शराब चले।

जहाँ भी हो अब चले आओ कि,
थमी धडकनों का हिसाब चले।

बेशक निगाह दरिया ना हो,
दर्द उठे तो सैलाब चले।

सच से पर्दा क्या उठा 'रोबिन',
महफ़िल से खुसूसी जनाब चले।

Saturday, December 12, 2009

इंतज़ार का महकमा

तेरी यादों का सिलसिला थमा कब।
इस बेरहम बाज़ार में मैं जमा कब।

तू था तो कुछ ख़ुशमिज़ाजी थी,
तू नहीं तब भी है मुझे सदमा कब।

दुनिया की चकाचौंध से सब सराबोर,
खैर मुझे भाया ही था ये मजमा कब।

अपनाया भी 'औ' ठुकराया भी तूने ही,
बस ये बता दे चला ये मुकदमा कब।

इश्क की गलियाँ अब देख-भाल ली मैंने भी,
देखना है मैं देता हूँ किसी को चकमा कब।

उसके फ़िराक में रोज़ नुक्कड़ पर चाय चलती है 'रोबिन',
नामालूम करेंगे बंद ये इंतज़ार का महकमा कब।


Tuesday, December 1, 2009

मजबूर इश्क

मेरा दिल तेरे इश्क में भले मजबूर सही।
दौलत के हाथों बिकना पर मुझे मंजूर नहीं।

ये दुनिया गर अपनों का ऐसे इम्तेहां लेती है,
नहीं चाहिए कोई, यहाँ से ले चल दूर कहीं।

तू हो और जरूरी असबाब हो जीने को,
फ़िर ना आसमां चाहिए 'रोबिन' ना जमीं।

मरने के बाद कुछ नसीब होता हो तो तू हो,
न किस्मत चाहिए न जन्नत की दिलकशीं।



Thursday, October 1, 2009

मजाज़

आप खुश हुए तो ख़ुद पे भी नाज़ आया।
ज़िन्दगी और हसीनतर जीने का अंदाज़ आया।

दर्द हद से फिर बढ़ा उसके पास ना होने से ,
लगा जैसे 'रोबिन' में उतर कहीं से 'मजाज़' आया।

Monday, March 30, 2009

लम्हा-लम्हा थोड़ा सुरूर है।
आपकी दीवानगी का ये कसूर है।

अच्छा था जब तन्हा था अकेला था,
आहट से तेरी दिल मगरूर है।

तेरी दस्तक से होती है धड़कनें सुर्ख,
कुछ तो है जो मुझे हुआ जरूर है।

Monday, March 2, 2009

1. चंद झूठ इस जहाँ में सच के पैर लेकर चलते हैं !
अपनों का किसे यकीन हम साथ गैर लेकर चलते हैं !!

Tuesday, February 10, 2009

2. तुम्हे कुछ भी अच्छा नहीं लगता,
है वो क्या जो बुरा नहीं लगता !!
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