Friday, April 3, 2009

कॉलेज की वो राहें (रचना --- मुकुल सिन्हा )

राह देखी थी इस दिन की कबसे ,
आगे के सपने सजा रखे थे ना जाने कबसे .
बड़े उतावले थे यहाँ से जाने को ,
ज़िन्दगी का अगला पड़ाव पाने को .

पर ना जाने क्यों ..दिल में आज कुछ और आता है ,
वक़्त को रोकने का जी चाहता है .

जिन बातों को लेकर रोते थे आज उन पर हंसी आती है ,
न जाने क्यों आज उन पलों की याद बहुत आती है

कहा करते थे ..बड़ी मुश्किल से चार साल सह गया ,
पर आज क्यों लगता है की कुछ पीछे रह गया .

न भूलने वाली कुछ यादें रह गयी ,
यादें जो अब जीने का सहारा बन गयी .

मेरी टांग अब कौन खींचा करेगा ,
सिर्फ मेरा सर खाने कौन मेरा पीछा करेगा .
जहां 200 का हिसाब नहीं वहाँ 2 रूपए के लिए कौन लडेगा ,

कौन रात भर साथ जग कर पड़ेगा ,
कौन मेरे नए नए नाम बनाएगा .
में अब बिना मतलब किससे लडूंगा ,
बिना topic के किस्से फालतू बात करूंगा ,

कौन फ़ैल होने पर दिलासा दिलाएगा ,
कौन गलती से नंबर आने पर गालियाँ सुनाएगा .

रेडी पर चाय किस के साथ पियूंगा ,
वो हसीं पल अब किस के साथ जियूँगा ,

ऐसे दोस्त कहाँ मिलेंगे जो खाई में भी धक्का दे आयें ,
पर फिर तुम्हें बचाने खुद भी कूद जायें .

मेरे गानों से परेशान कौन होगा ,
कभी मुझे किसी लड़की से बात करते देख हैरान कौन होगा ,

कौन कहेगा साले तेरे joke पे हंसी नहीं आई ,
कौन पीछे से बुला के कहेगा ..आगे देख भाई .

अचानक बिन मतलब के किसी को भी देख कर पागलों की तरह हँसना ,
न जाने ये फिर कब होगा .

दोस्तों के लिए प्रोफ़ेसर से कब लड़ पाएंगे ,
क्या हम ये फिर कर पाएंगे ,

कौन मुझे मेरे काबिलियत पर भरोसा दिलाएगा ,
और ज्यादा हवा में उड़ने पर ज़मीन पे लायेगा ,

मेरी ख़ुशी में सच में खुश कौन होगा ,
मेरे गम में मुझ से ज्यादा दुखी कौन होगा ...

कह दो दोस्तों ये दुबारा कब होगा ....????
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मुकुल सिन्हा

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