अँधेरे में पसरती हैवानियत को किसने देखा।
अपनों के हाथों लुटती अस्मत को किसने देखा।
पाल नहीं सकते तो औलादें करने की क्या जरूरत,
कल कूड़ेदान में पड़ी मासूमियत को सबने देखा।
मुफलिसी का सबब देकर गुनाह ठीक नहीं,
एक गिलहरी को पाते अज़मत आदम ने देखा।
सेंकती थी नरम रोटियाँ, चूल्हे पे वो मुस्कुराके,
तवे से टकराती उन उँगलियों की अज़ियत को हमने देखा।
औरत होकर औरत पे सितम तो बेईमानी हुई,
दहेज़ की लपट में सिसकती इंसानियत को तूने देखा?
वो माँ है, बेटी भी, दोस्त भी, बहन भी और संगिनी भी,
समझे वोही 'रोबिन', घर में खनकती इस कुदरत को जिसने देखा।
I am an agent of chaos and a perplexed freak !! लेकिन चंद लोग मेरे आस-पास ऐसे हैं जो मेरे लिए न केवल प्रेरणा हैं किन्तु उम्मीद की किरनें भी हैं !! बस उन्हीं को समर्पित....
Thursday, September 16, 2010
Monday, September 13, 2010
प्रकृति
प्रकृति की विरह वेदना,
मानव कब समझ पाया है।
स्व-चेतना के मदांध में,
अल्प-ज्ञान को विराट जोहकर
केवल स्वार्थ पूर्ति हेतु
प्रकृति को नष्ट-भ्रष्ट किया है।
परिवर्तन को दैवीय कोप मानकर
एक कल्पित जगत में
सदैव मानव जिया है।
मूल्य समझने होंगे
विश्वास पाना होगा
फ़िर से
प्रकृति का
क्यूँकि प्रकृति माँ है
और माँ अधिक काल तक कुपित ऩही रहती !!
मानव कब समझ पाया है।
स्व-चेतना के मदांध में,
अल्प-ज्ञान को विराट जोहकर
केवल स्वार्थ पूर्ति हेतु
प्रकृति को नष्ट-भ्रष्ट किया है।
परिवर्तन को दैवीय कोप मानकर
एक कल्पित जगत में
सदैव मानव जिया है।
मूल्य समझने होंगे
विश्वास पाना होगा
फ़िर से
प्रकृति का
क्यूँकि प्रकृति माँ है
और माँ अधिक काल तक कुपित ऩही रहती !!
Saturday, September 11, 2010
एक ख्वाब चले
चल सके तो एक ख्वाब चले।
खुदा करे आसपास शबाब चले।
तेरी आँखों का तिलिस्म ठहरे,
फिर कहाँ कोई रुआब चले।
तुम कभी सीधा सवाल पूछो,
तब तो कोई जवाब चले।
मैखाने की फितरत भी अजब,
शराबी गिरे पर शराब चले।
जहाँ भी हो अब चले आओ कि,
थमी धडकनों का हिसाब चले।
बेशक निगाह दरिया ना हो,
दर्द उठे तो सैलाब चले।
सच से पर्दा क्या उठा 'रोबिन',
महफ़िल से खुसूसी जनाब चले।
खुदा करे आसपास शबाब चले।
तेरी आँखों का तिलिस्म ठहरे,
फिर कहाँ कोई रुआब चले।
तुम कभी सीधा सवाल पूछो,
तब तो कोई जवाब चले।
मैखाने की फितरत भी अजब,
शराबी गिरे पर शराब चले।
जहाँ भी हो अब चले आओ कि,
थमी धडकनों का हिसाब चले।
बेशक निगाह दरिया ना हो,
दर्द उठे तो सैलाब चले।
सच से पर्दा क्या उठा 'रोबिन',
महफ़िल से खुसूसी जनाब चले।
Sunday, April 18, 2010
ऐतबार क्यूँ नहीं
दिल में कुछ है तो इकरार क्यूँ नहीं।
नफरत है गर इतनी तो प्यार क्यूँ नहीं।
नाज़ुक हथेली का निशाँ दायें रुखसार पे,
पर एक बार क्यूँ , बार-बार क्यूँ नहीं।
तेरी उल्फत का तरीका भी अज़ब है,
यादें दी गालियाँ भी, फिर दीदार क्यूँ नहीं।
मुझे अखबार कर दिया तूने बिना कुछ जाने,
दीवाना कहा पर कहा अपना बीमार क्यूँ नहीं।
नामालूम किस स्याही से इश्क लिखा तेरे दिल पे,
तुझे जहाँ पे यकीन है, मुझपे ऐतबार क्यूँ नहीं।
नफरत है गर इतनी तो प्यार क्यूँ नहीं।
नाज़ुक हथेली का निशाँ दायें रुखसार पे,
पर एक बार क्यूँ , बार-बार क्यूँ नहीं।
तेरी उल्फत का तरीका भी अज़ब है,
यादें दी गालियाँ भी, फिर दीदार क्यूँ नहीं।
मुझे अखबार कर दिया तूने बिना कुछ जाने,
दीवाना कहा पर कहा अपना बीमार क्यूँ नहीं।
नामालूम किस स्याही से इश्क लिखा तेरे दिल पे,
तुझे जहाँ पे यकीन है, मुझपे ऐतबार क्यूँ नहीं।
Tuesday, April 6, 2010
I was made for U
I stand tall here for the
world to see.
they wonder how perfect
someone's life could be.
they see the laughs,
and d wins.
how easy in ma favour
d wheel spins.
But when I m blue, even i don't
know d reason why
you come around to keep
me from a cry
sumtimes i might not see u
when i m in gold
but when m low, there's never a time
when i don't feel your hold.
Sweety no one knows me
d way u do.
I was made for U
I was made for U.
--- pal
world to see.
they wonder how perfect
someone's life could be.
they see the laughs,
and d wins.
how easy in ma favour
d wheel spins.
But when I m blue, even i don't
know d reason why
you come around to keep
me from a cry
sumtimes i might not see u
when i m in gold
but when m low, there's never a time
when i don't feel your hold.
Sweety no one knows me
d way u do.
I was made for U
I was made for U.
--- pal
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