Tuesday, February 10, 2009

रीतिकाल के प्रेम भरे पद-छंद पढा रहे ,
थे गुरूजी B.A. की क्लास में |
राधा तन रंग भरे श्याम-नैनों में आकंठ ,
डूबी मगन रहे प्रेम-धुन रंग-रास में |
सुजान-प्रेमी घनानंद से ये पद अनूठे,
लिखते वही रम जो जाते प्रेम उजास में |
करके ख़त्म लेक्चर प्रसन्न गुरूजी निकले,
देखे एक छोरा-छोरी बैठे पास-पास में |
गुरूजी को देख अचम्भे में , छोरा बोला,
सर समझी नहीं ये कुछ क्लास में |
इसीलिए अब प्रेम भाव समझा रहा हूँ,
तसल्ली से बैठकर इस घास में ||
2. तुम्हे कुछ भी अच्छा नहीं लगता,
है वो क्या जो बुरा नहीं लगता !!

Monday, February 9, 2009

मेरे अशआर

1. नज़र आती है तू हरसू सच कहता हूँ,
तड़प उठती है आरजू सच कहता हूँ !
किसी से अब भूले से भी बात नहीं होती,
होती है बस तेरी गुफ्तगू सच कहता हूँ !!

2. कारगुजारियां जनाब की मशहूर हैं आलम-इ-इश्क में भले मगर,
कोई अदा हम पर मर नहीं सकती, मैं आशिक हो नहीं सकता ||

दिनचर्या (संकलित) by- deepti

सुन्दर उँगलियों वाली
एक लड़की
बुहारती है एकांत को
लगा देती है ढेर
एक कोने में
धोती है फुरसतों को
सुखाती है डोरियों पर
दो सलाइयों पर
बुनती है व्यस्तता
एक के दो
दो के चार
करीने से सजा रखती है
परम्पराएं,
मांज कर
रख देती है
इच्छाओं को
कुकर में
और बंद कर देती है
ढक्कन
पूरे प्रेशर के साथ
1

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