रीतिकाल के प्रेम भरे पद-छंद पढा रहे ,
थे गुरूजी B.A. की क्लास में |
राधा तन रंग भरे श्याम-नैनों में आकंठ ,
डूबी मगन रहे प्रेम-धुन रंग-रास में |
सुजान-प्रेमी घनानंद से ये पद अनूठे,
लिखते वही रम जो जाते प्रेम उजास में |
करके ख़त्म लेक्चर प्रसन्न गुरूजी निकले,
देखे एक छोरा-छोरी बैठे पास-पास में |
गुरूजी को देख अचम्भे में , छोरा बोला,
सर समझी नहीं ये कुछ क्लास में |
इसीलिए अब प्रेम भाव समझा रहा हूँ,
तसल्ली से बैठकर इस घास में ||
I am an agent of chaos and a perplexed freak !! लेकिन चंद लोग मेरे आस-पास ऐसे हैं जो मेरे लिए न केवल प्रेरणा हैं किन्तु उम्मीद की किरनें भी हैं !! बस उन्हीं को समर्पित....
Monday, February 9, 2009
मेरे अशआर
1. नज़र आती है तू हरसू सच कहता हूँ,
तड़प उठती है आरजू सच कहता हूँ !
किसी से अब भूले से भी बात नहीं होती,
होती है बस तेरी गुफ्तगू सच कहता हूँ !!
2. कारगुजारियां जनाब की मशहूर हैं आलम-इ-इश्क में भले मगर,
कोई अदा हम पर मर नहीं सकती, मैं आशिक हो नहीं सकता ||
तड़प उठती है आरजू सच कहता हूँ !
किसी से अब भूले से भी बात नहीं होती,
होती है बस तेरी गुफ्तगू सच कहता हूँ !!
2. कारगुजारियां जनाब की मशहूर हैं आलम-इ-इश्क में भले मगर,
कोई अदा हम पर मर नहीं सकती, मैं आशिक हो नहीं सकता ||
दिनचर्या (संकलित) by- deepti
सुन्दर उँगलियों वाली
एक लड़की
बुहारती है एकांत को
लगा देती है ढेर
एक कोने में
धोती है फुरसतों को
सुखाती है डोरियों पर
दो सलाइयों पर
बुनती है व्यस्तता
एक के दो
दो के चार
करीने से सजा रखती है
परम्पराएं,
मांज कर
रख देती है
इच्छाओं को
कुकर में
और बंद कर देती है
ढक्कन
पूरे प्रेशर के साथ
एक लड़की
बुहारती है एकांत को
लगा देती है ढेर
एक कोने में
धोती है फुरसतों को
सुखाती है डोरियों पर
दो सलाइयों पर
बुनती है व्यस्तता
एक के दो
दो के चार
करीने से सजा रखती है
परम्पराएं,
मांज कर
रख देती है
इच्छाओं को
कुकर में
और बंद कर देती है
ढक्कन
पूरे प्रेशर के साथ
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