Monday, March 2, 2009

1. चंद झूठ इस जहाँ में सच के पैर लेकर चलते हैं !
अपनों का किसे यकीन हम साथ गैर लेकर चलते हैं !!

Friday, February 27, 2009

अंदाज़ और जिंदगी

अकेले बसर जो की ज़िन्दगी तो बेवफाई जानिये |
नाज़ न उठाये किसी नाज़नीं के तो हरजाई जानिये |

वक्त हो शाम का, बैठा हो रहबर पहलू में ,
फिर चाँद के अफसानों को आशनाई जानिये|

बिखरा हो शबाब आस-पास, उँगलियों में जाम हो
निकल आना उठकर महफिल की रुसवाई जानिये|

दोस्त बस दोस्त रहे मुहब्बत का मसीहा न हो,
गर करे बात-बात पे तारीफ़ महबूब का शैदाई जानिये|

तरन्नुम में वो कातिल बाहें गले में डाले हो 'रोबिन' ,
चिरियों की चहचाहट को बस बजती शहनाई जानिये |

कुछ और

ये नज़र-अंदाजी की अदा कुछ और होती |
गर तेरी दिलचस्पी मुझमें थोडी और होती |

तेरी चितवन उफ़! क्या उलझन भरी है,
यूँ उलझते ना जो निगाह कुछ और होती |

सवाल यारों के, जनाब कहाँ तक पहुँची बातें,
मुस्कुरा के क्यूँ टालते जो बात कुछ और होती |

कलाकार है,उसकी कलाकारी के हम कायल हैं,
थोड़ा रंग हमारा लेती तो कला कुछ और होती |

कैसे भुलाएं तुझे, भले भूलने को मजबूर हों,
तू बेवफा होती तब वजह कुछ और होती |

'रोबिन' नसीब है किसी शैदाई की वो महज़बीं,
पल भर मेरी होती,चाहे किस्मत कुछ और होती |
तेरी छुअन का असर शेष है हथेली पर |
लाख दीवाने भले तेरे, है तू अकेली पर |

जान-लेवा है तेरी आदत,मुंह फेर लेने की,
निकले ज़नाजा जब,खडी रहना हवेली पर|

झेलना दुशवार हो चले गर दुनिया के ताने,
कोसना हमें, इल्जाम डाल देना सहेली पर|

उम्र ढलते-ढलते हम बदल जाएँ गिला नही 'रोबिन',
रब करे वो दुल्हन सी रहे, सदा नई-नवेली पर |

Wednesday, February 11, 2009

कुछ और बातें


जिंदगी फलसफों पे गुजारी नही जाती !
आबो-हवा बदलने से बीमारी नही जाती !!

शबनम सी खो जाती है बीती यादें ,
वो पहले प्यार की खुमारी नही जाती !

मानता हूँ कितना झूठ है यहाँ रिश्तों का सच,
कुछ कड़ियाँ फ़िर भी बचती है,सारी नही जाती !

आदत है ठुकराए जाने की हम दरख्तों को,
पर बहार में जवाँ होने की बेकरारी नही जाती !

जहाँ भर की जिल्लत से डरे वो आशिक नही,
बाज़ी दिल की जीती जाती है ,हारी नही जाती !

अपने ही निगेह्बानों को भुला देते है लोग 'रोबिन',
बस ख़ास दौड़ता है यहाँ ,आम सवारी नही जाती !
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